मध्य प्रदेश

बार काउंसिल के नियमों की हो रही अनदेखी

भोपाल

प्रदेश के लॉ कालेजों में इन दिनों कानून के छात्रों को विधि के प्रोफेसर्स नहीं बल्कि गणित, पॉलिटिकल साइंस और इकोनामिक्स के प्रोफेसर्स कानून की शिक्षा दे रहे हैं। ऐसे में यह प्रोफेसर्स भला विधि के छात्रों को कैसी कानून की शिक्षा देते होंगे इसक अंदाजा लगाना मुश्किल है। लॉ कालेज की मान्यता से लेकर पाठ्यक्रम तक बार काउंसिल ऑफ इंडिया तय करता है।

इसके बावजूद भी कॉलेज प्रबंधन को बार काउंसिल के नियमों की कोई परवाह नहीं है। मंडला जिले के रानी दुर्गावती लॉ कॉलेज की बात करें तो यहां के प्रिंसिपल विजेन्द्र चौरसिया है जो गणित के प्रोफेसर हैं। झाबुआ विधि कॉलेज में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर जगदीश चंद्र सिन्हा प्राचार्य हैं। इसी तरह एमएसबी कॉलेज ग्वालियर में कॉमर्स के प्रोफेसर पुरूषोत्तम गौतम प्राचार्य हैं। वहीं सीहोर के चंद्रशेखर आजाद शासकीय कॉलेज में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर प्राचार्य पद संभाल रहे हैं। लेकिन यहां पिछले चार साल से विधि के छात्रों का प्रवेश दाखिला नहीं हो रहा है। प्रदेश में मौजूदा समय में 40 शासकीय कॉलेज ऐसे हैं जहां विधि की पढ़ाई हो रही है। अधिकांश कॉलेजों में कमोबेश यहीं स्थिति है।

लॉ कॉलेज में 10 प्रोफेसर्स होने चाहिए
बार काउंसिल ऑफ इंडिया की गाइडलाइन में साफ उल्लेख है कि लॉ कॉलेज में प्रिंसिपल सहित 10 विधि के प्रोफेसर्स होने चाहिए। लेकिन भोपाल के विधि कॉलेज को छोड़ दिया जाए तो कहीं पर भी बार काउंसिल के नियमों का पालन नहीं हो रहा है। काउंसिल के गाइडलाइन में यह भी नियम है कि अगर आयोग द्वारा कॉलेजों में विधि के प्रोफेसर्स की भर्ती नहीं हो रही है तो कॉलेज प्रबंधन अपने यहां संविदा या गेस्ट लेक्चर के तौर पर प्रोफेसर्स को नियुक्त कर सकता है ।

केवल शर्त यहीं है कि संविदा के प्रोफेसर्स को नियमित प्रोफेसर्स का वेतन देना होगा। इस नियम का पालन केवल अशोकनगर के लॉ कालेज में किया जा रहा है। बाकि कॉलेजों में बार काउंसिल के किसी भी नियम का पालन नहीं हो रहा है।

प्रदेश के अधिकांश लॉ कालेजों में बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों का पालन नहीं हो रहा है। कॉलेज प्रबंधन को इस दिशा में गंभीरता से विचार करना चाहिए। बार काउंसिल कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र है।
विजय चौधरी, मेंबर, बार काउंसिल

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