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कामना ही दुख का कारण है – आचार्य विजय राज जी

संसार कामनाओं से जल रहा है-आचार्य विजय राज जी-

राजनांदगांव 8 दिसंबर। आचार्य श्री विजय राज जी ने कहा कि साधक तीन प्रकार के होते हैं पहला कामना प्रेरित, दूसरा भावना प्रेरित और तीसरा साधना प्रेरित। उन्होंने कहा कि कामना ही दुख का कारण है। कामना की पूर्ति नहीं होती तो हम दुखी हो जाते हैं। संसार में कामना ही सबसे बुरी चीज है। कामनाएं कभी पूरी नहीं होती। हम अगर यह चिंतन करें कि क्या किसी की कामना कभी पूर्ण हुई है तो फिर हमारी कामनाएं अपने आप ही कम होने लगेगी।
         स्थानीय बसंतपुर थाना के बगल में स्थित जैन स्थानक भवन में आज आचार्य श्री ने अपने प्रवचन में कहा कि कामना को जीतने वाला ही सुखी है और कामना में जीने वाला दुखी है। कामना की पूर्ति के लिए लोग साधना करते हैं। साधना, भावना से प्रेरित होती है तो वह साधना उच्च होती है। अपने देव गुरु धर्म के प्रति हमारी श्रद्धा कमजोर है जिसकी वजह से हम पिछड़ते हैं। हमारी श्रद्धा मजबूत होनी चाहिए तभी हमारी संस्कृति बलवान होगी। उन्होंने कहा कि अगर सुखी होना चाहते तो कामना का त्याग करना होगा।         आचार्य श्री ने कहा कि कामना रहित साधना के परिणाम भी अच्छे ही आते हैं। एक नमस्कार संसार का सार है। नमस्कार संसार सागर से तिरा देता है क्योंकि उस नमस्कार के साथ कोई कामना नहीं होती। यदि हम कामना मन में रखकर साधना करते हैं तो हो सकता है कि हमारी कामना पूरी हो जाए किंतु उसका परिणाम अपेक्षित नहीं आएगा। कामना, मरना समान है। उन्होंने कहा कि भगवान से यदि कुछ मांगना ही है तो यह मांगों कि हमें ऐसा ज्ञान दो कि मन के भीतर की सारी कामनाएं हमारी समाप्त हो जाए। यह संसार कामनाओं से जल रहा है।
     आचार्य श्री ने कहा कि संसार में संतोष से बड़ा धर्म कोई नहीं है। संयम से, समझ से हम कामना से बाहर आ सकते हैं। अभागा वह नहीं जिसके पास माया नहीं है बल्कि अभागा तो वह है जिसके पास गुरु की छाया नहीं है। जो है उसे पर्याप्त मानना चाहिए। मानोगे तो ठीक है नहीं मानोगे तो चिंता की चक्की में पिसते रहोगे। उन्होंने कहा कि धार्मिक उपकरणों, पुस्तकों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। धार्मिक उपकरणों की स्वच्छता रहती है तो मन भी स्वच्छ और स्वस्थ रहता है। साधना प्रेरित साधक सर्वोत्कृष्ट साधक होते हैं अनंत -अनंत उपकार होता तब कहीं जाकर घर में पवित्र आत्मा का जन्म होता है, इसलिए अपने बच्चों की सद् राह में बाधक नहीं बनना चाहिए। उन्हें संस्कारवान बनाना चाहिए।

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