बंद कमरे में भी जरूरी है मर्जी मैरिटल रेप कानूनन अपराध माना जाए-कीर्ति कुल्हारी

फिर चाहे पिंक फिल्म हो या मिशन मंगल या फिर वेब सीरीज च्फोर मोर शॉट्स प्लीज, ऐक्ट्रेस कीर्ति कुल्हारी ने हर बार अपने किरदारों के जरिए महिला सशक्तिकरण की आवाज बुलंद की है। इसी कड़ी में अपनी हालिया वेब सीरीज च्क्रिमिनल जस्टिस: बिहाइंड क्लोज्ड डोर्सज् में वह मैरिटल रेप जैसे गंभीर मुद्दे का दर्द बयां करती दिखीं। च्नवभारत टाइम्सज् से खास बातचीत में कीर्ति कहती हैं कि मैरिटल रेप समाज के किसी खास तबके की नहीं, बल्क िहमारी सोशल कंडीशनिंग की समस्या है। हमें समझना होगा कि बंद कमरे में भी एक-दूसरे की मर्जी जरूरी है। मैरिटल रेप को कानूनन अपराध माना जाना चाहिए और इसके लिए भी सजा होनी चाहिए।
सीरीज में आपका किरदार अनु चंद्रा पढ़ी-लिखी होने के बावजूद वर्षों तक पति की जबरदस्ती सहती है। एक और किरदार भी शादी में समझौते की बात कहती है। ये जो च्सहना तो औरतों को ही पड़ता हैज् वाली मानसिकता है, उस पर आपकी क्या राय है?
ये हमारे समाज की कड़वी सचाई है। इसीलिए मैं ये शो करना चाहती थी। औरतों पर फिजिकल ही नहीं, कई तरह के मेंटल, इमोशनल एब्यूज भी होते हैं, जिसे वे सहती रहती हैं, क्योंकि ये सोशल कंडीशनिंग है हमारी। हमें लगता है कि मैरिटल रेप छोटे तबकों या अनपढ़ लोगों के बीच होता है, जबकि ये क्लास या शिक्षा की बात है ही नहीं, ये हमारी सोशल कंडीशनिंग है। लड़कियों को समझा दिया जाता है कि शादी या रिश्ते की डोर उन्हें ही संभालनी है। उसे कॉम्प्रोमाइज या एडजस्टमेंट करनी होगी, लेकिन कहां तक सहना है, वो कोई नहीं बताता, जो कि बहुत खतरनाक चीज है। अनु इतने सालों तक खुद पर रेप होने देती है, क्योंकि हम ये मानते ही नहीं कि शादी में भी एक-दूसरे की मर्जी जरूरी है। हम तो ये मानकर चलते हैं कि शादी हो गई, तो आप एक-दूसरे की प्रॉपर्टी हैं। फिर जब हम चारों ओर यही देखते हैं, तो हमें लगता है कि यही नॉर्मल है। ये तो सभी के साथ हो रहा है। फिर पता भी कहां चलता है कि बंद दरवाजे के पीछे किसी के साथ क्या हो रहा है। जो चीज आपको रोकती है, वह है शर्म। शर्म सुनने में बहुत छोटा शब्द है, पर इसकी वजह से आप जिंदगी भर सहते रह सकते हैं। इसलिए, मेरा मानना है कि सही उम्र में सेक्स एजुकेशन जरूरी है। इस बारे में बातचीत होनी चाहिए।
आपके हिसाब से सहने या समझौते की हद कहां तक होनी चाहिए?
यह हर किसी के लिए अलग है। आपको खुद एक हद खींचनी होगी कि आप कितना सहने को तैयार हैं। यह पता चल जाता है कि ये सही नहीं लग रहा है। आपको किसी के तमाचा मारने तक का इंतजार करने की जरूरत नहीं है। इसका कोई क्राइटेरिया नहीं है, पर कुछ चीजें सही नहीं हैं। एक-दूसरे को मारना, टॉर्चर करना या गाली देना सही नहीं है। एक-दूसरे का अपमान करना सही नहीं है। मेरे हिसाब से रिश्ते में सम्मान प्यार से भी ज्यादा जरूरी है। वह सम्मान पहले आपको खुद को देना होगा, तभी दूसरा इंसान भी आपको सम्मान देगा। जहां सम्मान नहीं है, वहां चीजें कभी सही नहीं हो सकती। आपको पता होना चाहिए कि कब आपको कदम पीछे लेना है।
आप लगातार अपने किरदारों से एक किस्म से वुमन एंपावरमेंट कर रही हैं। आपके लिए वुमन एंपावरमेंट क्या है? और कौन से मुद्दे आपको सबसे ज्यादा परेशान करते हैं?
मैं कोई एक मुद्दा नहीं बता पाऊंगी। आप मेरा काम देखिए, उसमें जो भी मुद्दे दिखते हैं, मैं उनसे कनेक्ट करती हूं, इसीलिए अपने काम के जरिए उनके लिए आवाज उठाती हूं। मेरे लिए बहुत जरूरी है कि मैं अपना टाइम, ऐक्टिंग स्किल, एनर्जी, खून पसीना कहां लगा रही हूं। उसका कुछ मतलब होना चाहिए। मुझे लगता है कि अगर मैं समाज के लिए कुछ करना चाहती हूं, तो मेरे लिए सबसे बड़ा माध्यम मेरी ऐक्टिंग है। इसलिए, मैं ऐक्टर होने का फायदा उठाती हूं और ऐसी चीजें चुनती हूं, जिनमें मैं यकीन करती हूं और उसके खिलाफ बोलना चाहती हूं। जैसे, इसमें मैरिटल रेप या एब्यूज की बात हो गई या फोर मोर शॉट्स में इतने सारे मुद्दे हैं। रही बात एंपावरमेंट की, तो मेरे लिए असल एंपावरमेंट तब आती है, जब आप दूसरों को दोष देना छोड़ देते हैं। जब अपनी जिंदगी की डोर अपने हाथ में लेते हैं। अपने फैसले खुद करते हैं कि अच्छा या बुरा, ये मेरा फैसला है। इसके लिए मैं जिम्मेदार हूं। तब आप सही मायने में एंपावर्ड होते हैं।
मैरिटल रेप को कानूनन अपराध बनाए जाने को लेकर बहस चल रही है। इस बारे में आपकी क्या राय है?
ऐसा बिलकुल होना चाहिए। इसमें कोई दो राय ही नहीं है। अब वह समय आ चुका है कि मैरिटल रेप को कानूनन अपराध माना जाए और सजा की श्रेणी में लाया जाए।
अनु चंद्रा बहुत ही कॉम्पलेक्स किरदार है। उस दर्द को समझने के लिए आपने क्या रिसर्च या तैयारी की?
मैंने बहुत कुछ किया। ऐसी प्रताडऩा से गुजरी औरत को समझना और उसे निभाना बहुत मुश्किल था। इसी वजह से मैं यह रोल करना भी चाहती थी, पर मुझे पता था कि हां करके मैंने खुद के पांव पर कुल्हाड़ी मारी है। इसलिए, मैं कुछ मनोचिकित्सकों से मिली और इस दुनिया को समझने की कोशिश की कि यह प्रॉब्लम कितनी बड़ी है? किस हद तक है? उन्होंने कुछ केसेज भी मुझे बताएं, जिससे मुझे अहसास हुआ कि सचाई ज्यादा क्रूर है, सिनेमा में तो हम उसका दस प्रतिशत भी नहीं दिखाते हैं। मैंने इस दुनिया में भरोसा करना शुरू किया। फिर, अनु को डिप्रेशन और एंजाइटी भी है, तो उस बारे में भी समझने की कोशिश की, पर वाकई यह किरदार बहुत कॉम्प्लिकेटेड था।

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