झूठ जैसा न कोई शस्त्र और न कोई शास्त्र

डीयर क्या मैं डिप्रेशन में आ गया हूँ? अखबारों और चैनलों में निगेटिविटी सुनने और देखने को मिल रही है। सुबह का अखबार देखते ही दिल दहल जाता है। मानवता की ध”िायां उड़ाते लोग कड़वे, नीच, स्वार्थी और क्रूर बन रहे हैं। जैसे-जैसे चुनावी हवा बह रही है, वैसे-वैसे राजनीति के आकाश में विभिन्न राजनैतिक दल अपने-अपने झूठ की पतंगे उड़ाने में मशगुल हो गए हैं। आज के अधिकांश राजनेताओं का एक ही सत्तालेख है कि सत्य आप जो समझते हैं, वह नहीं। सत्य याने हम याने राजनेता जो समझता है वह। उस राजनेताओं के द्वारा या राजनीतिक दल के प्रवक्ता के द्वारा जो बोला गया, वही सच है। आम आदमी और खास आदमी याने कि जनता और राजनीतिज्ञ के सत्य में अंतर है। आम आदमी, प्रत्येक खास आदमी के मुंह से बोले गए शब्दों को ब्रह्मवाक्य समझकर उसे सच समझ लेने का आदी हो गया है। इसकी बखूबी जानकारी है खास आदमी को है। दूसरी ओर, आम आदमी को यह नहीं मालुम रहता कि जिसे वह ब्रहम्सत्य मान रहा है, वास्तव में वह भ्रम सत्य है।देख चम्पक, यह सच है कि 2021 में होने वाले चुनाव ब्लाक बस्टर साबित होंगे। लेकिन, तुम्हे डिप्रेशन क्यों होना चाहिए? चल तुझे रामप्रसाद की लजीज रबड़ी और मांगीलाल की जायकेदार मुंगौड़ी खिलाता हूं। मुड फ्रेश कर भाई, बाबूलाल ने कहा। बेशक, कुंभमेला सदृश्य राजनैतिक माहौल जम रहा है। चुनाव याने झूठ से भरे हुवे संभाषण और जो कभी पूरे न हो सके, वैसे वचनों का कुंभमेला कई राजनैतिक पंडित चुनावी पर्व में कर रहे हैं। झूठ की बारिश लिए वचनों और प्रवचनों को कुंभपर्व सदृश्य चुनाव के कुंभ मेले में स्नान करने से लगभग चुकते नहीं। इसे सामाजिक परिवर्तन ही कहना चाहिए कि अप्रिय झूठ भी आज प्रिय लगता है। समाज में झूठ बोलने वाला व्यक्ति भी अधिकांशत: लोगों को प्रिय लगता है।ठीक कहा बाबूलाल तुमने। सत्य का हाथ पकड़कर चलने से पूरे समाज में अप्रिय हो जाना, इससे बेहतर झूठ के हाथ सम्मानित होकर समाज में और राजनीति में सम्मानजनक जीवन जीना, इसी में सयानापन है। ऐसा कई प्रेक्टीकलवादियों का मानना है। सत्ता की सुरक्षा के लिए और लोकतंत्र की लाज रखने के लिए झूठ जैसा कोई शस्त्र भी नहीं है और न ही कोई शास्त्र है। ऐसा भी लोकतांत्रिक महानुभावों के द्वारा एक दूसरे को प्रेक्टीकली समझाया जाता है।सरकार की आलोचना क्या देश की आलोचना है?हाल ही कांग्रेस के दिग्गज नेता राहुल गांधी ने अपनी दादी स्व. इंदिरा गांधी द्वारा लगायी गई इमरजेंसी याने आपातकाल को उनकी भूल बताया और इसके लिए माफी भी मांगी। अब इसके बारे में तुम्हारा कहना क्या है बाबूलाल? चम्पक ने चर्चा का विषय ही बदल दिया। देखो डीयर, आलरेडी यू नो, आम और खास लोगों के मुंह बंद करने के लिए ही आपातकाल या उसी के समकक्ष कानून को सरकार हथियार बना देती है। सरकार नहीं चाहती कि कोई मौजुदा हालात पर सोचे और बोले। सरिता के अंक माह फरवरी (द्वितीय) में साफगोई से लिखने वाले भारत भूषण श्रीवास्तव कहते हैं कि वर्तमान सरकार ने बगैर आपातकाल लगाए उस से भी Óयादा कहर ढाना शुरू कर दिया है। पंजाब के होशियारपुर शहरवासी जसबीर सिंह ने फेसबुक में लाकडाउन को लागू करने के तरीके का आलोचनात्मक विरोध किया था। बस फिर संबंधित थाने में एफ.आई.आर. दर्ज हो गई। अपराध आरोपित हुआ कि धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाया व राजद्रोह हुआ है। उसे गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। बिना किसी जुर्म के 6 महिने जेल में काटने के बाद जसबीर जमानत पर बाहर आए।वर्तमान की नरेन्द्र भाई नेतृत्व की एन.डी.ए. सरकार में कई पत्रकारों को राजद्रोह के मामलों में महज सबक सिखाने की गरज से जेलयात्रा का लुफ्त प्रदान किया गया। जेल टूरिÓम के सभी मामले उतने ही हास्यास्पद व बचकाने हैं, जितना जसबीर सिंह का था। सुप्रसिद्ध शायर दुष्यंत कुमार ने इंदिरा गांधी वाले आपातकाल के दौरान उनकी तानाशाही पर यह शेर कहा था, जो आज भी मौजूद है-मत कहो कि आसमान में कोहरा घना है,यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है।साल 2020 में ”फेस आफ नेशनÓÓ पोर्टल के सम्पादक धवल पटेल, ”फ्रंटियर मणिपुरÓÓ न्यूज पोर्टल पओजेल चाओबा व धीरेन साड़ोकपाम, 7 अक्टूबर 2020 को केरल के पत्रकार सिद्दकी कप्पन, जिनका पोर्टल ”अजीमुखमÓÓ व उनके तीन साथियों को गिरफ्तार किया गया, इंग्लिश मैगजीन ”द कारवांÓÓ के सम्पादक व प्रकाशक परेशनाथ व अनंतनाथ, विनोद के जोस, इंडिया टूडे के पत्रकार राजदीप सरदेसाई, नेशनल हेराल्ड की वरिष्ठ सम्पादक मृणाल पांडे, कौमी आवाज के सम्पादक जफर आगा आदि सरकार की आलोचना निर्भीकतापूर्वक करते आए हैं। अफसोस यह है कि सरकार की आलोचना को ही देश की आलोचना माना जाता है।लोकतंत्र में हर नागरिक को स्वतंत्ररूप से अपनी राय रखने और सरकार के कामकाज की आलोचना करने का अधिकार है। अभिव्यक्ति के अपने संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल ही जागरूकता है।सच को परेशान किया जा सकता है, पराजित नहींबाबूलाल तुम्हारी बात का यह अर्थ निकलता है कि आजकल लोकतंत्र, संविधान और बोलने की आजादी के मायने बदल रहे हैं। अब बात और मुद्दा कोई भी हो, आप को सरकार से सहमत होना आना चाहिए। इसी में आप की खैर है। पत्रकारों को परेशान करने की गरज से अलग-अलग जगहों पर एफ.आई.आर. दर्ज कराना याने सच के खिलाफ आवाज उठाने वालों को अगर खरीद नहीं सकते, खुद से सहमत नहीं कर सकते तो कानून को हथियार बना कर उन्हें  परेशान करो ताकि उनकी हिम्मत टूट जाए। एक कहावत कि ”सच को परेशान तो किया जा सकता है, लेकिन पराजित नहीं किया जा सकता,ÓÓ उक्त संदर्भ में सटीक बैठती है।पंचायती राज या अफसर राज?जिला प्रशासन दो भागों में विभाजित है। पहला है नियामकीय, जिसके सर्वेसर्वा कलेक्टर हंै और दूसरा है विकासात्मक, जिसके सर्वेसर्वा जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी होते हैं। छत्तीसगढ़ में पंचायती अधिनियम लागू है। जिसमें जिला पंचायत याने स्वायत्त शासन संस्था का स्तर ऊंचा है। ग्राम पंचायतों के अधिकारों एवं कर्तव्यों में विशेष रूप से वृद्धि भी की गई है। सी.ई.ओ. याने मुख्य कार्यपालन अधिकारी प्रसाशनिक अधिकारों से सम्पन्न हैं। भ्रष्ट सरपंच को उसके भ्रष्टाचार की पुष्टि होने पर वापस बुलवाने का भी नियम है। पंचायती-राज का पवित्र उद्देश्य है कि ग्रामीण जनता और शासन में परस्पर सहयोग बढऩा चाहिए। वास्तव में पंचायतें लोकतंत्र की प्रयोगशाला हैं। यह जनता को अपने राजनीतिक अधिकारों के प्रयोग की शिक्षा देता है। साथ ही, उनमें गुणों का विकास करने में मदद भी करती है।विडम्बना यह कि पंचायती-राज क्या है? तो अधिकांश महिला और पुरूष जनप्रतिनिधियों को इसकी समझ ही नहीं है। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि पंचायतों को उचित प्रशिक्षण ही नहीं मिला। नियमित बैठकों की बात तो दूर, जन प्रतिनिधि आवश्यक बैठकों में भी जाना पसंद नहीं करते। इसमें सबसे दयनीय स्थिति महिलाओं की है। महिलाएं आज भी बैठकों में जाने से हिचकिचाती हैं।प्राप्त अधिकृत जानकारी के अनुसार जून-2020, अगस्त-2020, नवम्बर-2020, जनवरी-2021 की साधारण सभा की बैठकों में जनप्रतिनिधियों ने प्रस्ताव रखे थे। किन्ही ने विकास कार्यों में हो रही अनियमितताओं की शिकायतेंं की, किन्तु न प्रस्तावों पर अमल हुआ और न ही शिकायतों पर कार्यवाही हुई। वैसे पालन प्रतिवेदन की जानकारी लेने पर हकीकत पता लगेगी। उदाहरण के लिए खैरागढ़ विधायक प्रतिनिधि विनोद ताम्रकार ने ग्राम पंचायत कालेगोंदी के आश्रित ग्राम मरदकठेरा एवं तालाब गहरीकरण हुनईबंद में के जांच प्रतिवेदन पर असंतोष व्यक्त किया था। क्यों कि, दोषी पाए जाने के बाद भी दोषियों पर कोई कार्यवाही नहीं हुई थी। जब कि, ताम्रकार का प्रस्ताव उन्हें बर्खास्त करने को लेकर था। अन्य सदस्य नरसिंह भंडारी मानपुर के घोटिया-कन्हारगांव में डबरी निर्माण की शिकायत की जांच हेतु टीम गठित कर जांच कराए जाने हेतु पत्र प्रेषित किया था। किन्तु संबंधित रेंजर ने कहा कि उसे इस सम्बंध में उ”ााधिकारियों से किसी प्रकार की कोई सूचना नहीं मिली है। उपस्थित सदस्यों ने इस बात पर गहरी जानकारी व्यक्त की थी। अंत में राजनांदगांव के डी.एफओ. ने इसे अपनी जवाबदारी मानते हुवे खेद व्यक्त किया था। जिले भर में अनेक सड़क निर्माण व अन्य मनरेगा तहत कार्य हो रहे हैं, किन्तु निर्माण कार्यों से संबंधित जानकारी लिए बोर्ड ही नहीं लगे हैं। बैठक में एक जिला पंचायत सदस्य के द्वारा बताया गया कि बांधाबाजार में गौठान बना ही नहीं है और उसका भुगतान कर दिया गया है। ऐसे अनेक गंभीर शिकायतें जनप्रतिनिधियों के द्वारा विभिन्न जिला पंचायत की सभाओं में हमेशा की जाती हैं। किन्तु, उसका उचित प्रतिसाद नहीं मिलता। सरकार के विभागों में भ्रष्टाचार व अनियमितताएं जस की तस विद्यमान है। वास्तव में मुख्य कार्यपालन अधिकारी, पंचायतों की अवहेलना, जनपद तथा जिला पंचायत द्वारा किए गए प्रस्तावों पर अमल नहीं करते। अनेक अधिकारी सभाओं में उपस्थित ही नहीं होते।  पंचायती राज की तीन सीढिय़ां हंै। ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत, खण्डस्तर जनपद पंचायत और जिला स्तर पर जिला पंचायत। इनमें जमीनी स्तर पर प्रगति कम और कागजी प्रगति Óयादा रहती है।अवैध उत्खनन-परिवहन ”आऊट आफ कन्ट्रोलÓÓरेत का अवैध उत्खनन अनियंत्रित है। अवैध उत्खनन से ताप्तर्य यह कि वे रेत खदानें जहां खदान की अनुमति नहीं दी गई है। इसी से जुड़ा अवैध परिवहन भी है, जो क्लाईमैक्स पर है। खनिज विभाग के अधिकारियों के अलावा जिला स्तर से तहसील स्तर के सभी राजस्व अधिकारियों को भी अवैध खदानों व अवैध परिवहन का निरीक्षण करने का विधिवत अधिकार प्राप्त है। इसके बावजुद खनिज पदार्थों में रायल्टी की चोरी थम नहीं रही है। रेत के अवैध उत्खनन का मामला विधानसभा के सदन में गूंजा है। रेत माफियाओं के हौंसले फिर भी बुलन्द हैं। जिले भर में बड़ी संख्या में ईंट भठ्ठे भी संचालित हैं, जिनके वैध-अवैध होने पर भी सवालिया निशान लगा है। जिले भर में करोड़ों की तादात में ईंटें बनती हैं, किन्तु सरकार को बमुश्किल चंद लाखों ईंटों की ही रायल्टी मिलती है। मिट्टी, क्रेशर खदानें पत्थर खदानेेें तो मौत की खाई तक गहरी हैं। जिससे भी खनिज अधिनियमों की उड़ रही ध”िायों की पुष्टि होती है। अब इसे भ्रष्टाचार की इंतिहा हो गई, कहना चाहिए।अनाम चंद लाइने खिदमत में– है बहुत कठिनाइयां इंसान के आगे,सब ग्वारा है हमें ईमान के आगे।रोशनी बदनाम न हो जाए इस डर से,रख दिया है हमनें दीया तूफान के आगे।- दीपक बुद्धदेव

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