
राजनांदगांव : इच्छाएं कभी खत्म नहीं होती-मुनि वीरभद्र
हमने अपने अवगुणों को गुणों में बदलने की कोशिश नहीं की और ना इसके बारे में कभी सोचा-मुनि वीरभद्र
चातुर्मासिक प्रवचन
राजनांदगांव, विनय कुशल मुनि के सुशिष्य एवं 171 दिन तक उपवास का रिकॉर्ड बनाने वाले जैन मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने आज यहां कहा कि इच्छाएं कभी खत्म नहीं होती। एक इच्छा पूर्ण होती तो दूसरी इच्छा जागृत हो जाती है। हम अनंत काल से 84 लाख योनियों में घूम रहे हैं। उसके अंदर जीव कभी खुश होता है तो कभी दुखी होता है और कभी जीतता है तो कभी हारता है।
जैन बगीचे के उपाश्रय भवन में आज मुनि वीरभद्र (विराग) ज़ी ने कहा कि अनंत काल में घूमते हुए भी हमने अपने अवगुणों को गुणों में बदलने की कोशिश नहीं की और ना इसके बारे में कभी सोचा। उन्होंने कहा जिस दिन हम अपने अवगुणों को गुणों में बदल देंगे उस दिन हम मोक्ष प्राप्त कर लेंगे और हमें इन 84 लाख योनियों के भटकाव से छुटकारा मिल जाएगा। मुनिश्री ने कहा कि यह जीव कभी राम बन जाता है तो कभी रावण, कभी कृष्ण बन जाता है तो कभी कंस। अनंत काल से यह जीव आगे-पीछे,आगे- पीछे भटकते रहा है। यदि हम अपने आप को देखें तो हम अपने आपको वहीं के वहीं पाएंगे जहां हम पहले थे।आगे-पीछे,आगे- पीछे भटकते रहने के कारण हम आगे नहीं बढ़ पाए।
मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने कहा कि हम स्वयं अपने गुणों को, अपने स्वभाव को पाने का प्रयास नहीं करते। उन्होंने कहा कि जिस दिन इच्छाएं शांत हो जाएगी, मन में एक भी इच्छा नहीं रहेगी, उस दिन हम आनंद से भर जाएंगे। उन्होंने कहा कि इन्हीं इच्छाओं को पूरा करते-करते यह जीव संसार छोड़ जाता है और अपने आत्म कल्याण के लिए कुछ नहीं कर पाता। ऊपर – ऊपर की इच्छाएं बढ़ती जाती है और पहले की इच्छाएं अपने आप दबती चली जाती है, उसका कोई महत्व नहीं रहता और वह अतृप्त रह जाती है। सुखी रहने के लिए मन का इच्छारहित होना जरूरी है।
मुनि वीरभद्र (विराग) ज़ी ने कहा कि कोई अपनी तारीफ कर रहा हो तो उस समय समता रखना मुश्किल हो जाता है। हर पल समता में रहने की कोशिश कीजिए। उन्होंने कहा कि हमें जगत का नॉलेज है किंतु अपनी आत्मा के बारे में ही नॉलेज नहीं है। सारी आराधना मात्र समता लाने के लिए ही होती है। प्रमाद हमें कहीं ना कहीं अटका देता है। जो करना है अभी कर लें, बाद में मौका नहीं मिलेगा। यह जानकारी एक विज्ञप्ति में विमल हाजरा ने दी।


