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Farming: चिलचिलाती गर्मी में ये 5 सब्जियां देंगी बेकार पथरीली जमीन पर भी छप्परफाड़ पैसा, देखे बंपर पैदावार की A TO Z जानकारी

Farming: किसान अक्सर खेती करने से हिचकिचाते हैं। यह बात मार्च और अप्रैल की चिलचिलाती गर्मी के दौरान खास तौर पर सच होती है, जब पानी की भारी कमी होती है, जिससे किसान कोई भी जोखिम उठाने से कतराते हैं। हालाँकि, अगर आप सही फसलें चुनते हैं, तो ऐसी पथरीली ज़मीन से भी काफी मुनाफा कमाया जा सकता है। इसके लिए न तो बहुत ज़्यादा पानी की ज़रूरत होती है और न ही भारी-भरकम आर्थिक निवेश की। बस थोड़ी सी सही जानकारी और कड़ी मेहनत से, आप कम लागत में बेहतरीन पैदावार हासिल कर सकते हैं।

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कृषि विशेषज्ञ योगेंद्र सिंह के अनुसार, पथरीली ज़मीन पर करेले की खेती करना एक समझदारी भरा फैसला है। ऐसा करने के लिए, आपको ज़मीन में छोटे-छोटे गड्ढे बनाने होंगे, जिनके बीच एक से डेढ़ फुट की दूरी हो, और हर गड्ढे में दो से तीन बीज बोने होंगे। एक एकड़ खेत के लिए लगभग एक से दो किलोग्राम बीज काफी होते हैं। क्योंकि गर्मी बहुत ज़्यादा होती है, इसलिए हर 4 से 5 दिन में हल्की सिंचाई ज़रूर करें; हालाँकि, इस बात का ध्यान रखें कि गड्ढों में पानी जमा न होने पाए। चूंकि पत्थर जल्दी गर्म हो जाते हैं, इसलिए शाम के समय सिंचाई करना पौधों के लिए ज़्यादा फायदेमंद साबित होता है।

भिंडी की खेती

पथरीली ज़मीन के लिए भिंडी की खेती एक बेहतरीन विकल्प मानी जाती है, क्योंकि इस फसल को ज़्यादा पानी की ज़रूरत नहीं होती। भिंडी के बीज हमेशा कतारों में बोएं, और पौधों के बीच लगभग 1.5 फ़ीट की दूरी रखें। प्रति एकड़ लगभग 8 से 10 किलोग्राम बीजों की ज़रूरत होती है। बुवाई के तुरंत बाद पहली सिंचाई करें, और उसके बाद, मिट्टी में नमी के स्तर के हिसाब से हर 6 से 9 दिन में पानी देते रहें। भिंडी की फसल गर्मी के प्रति सहनशील होती है, और बाज़ार में इसकी मांग हमेशा ज़्यादा रहती है।

बरबटी की खेती

कम उपजाऊ, रेतीली या पथरीली ज़मीन में बरबटी (लोबिया/काउपिया) की खेती बहुत सफल साबित होती है। यह सब्ज़ी की फसल सूखे की स्थिति को भी झेल सकती है और मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में भी मदद करती है। हर गड्ढे में एक या दो बीज बोएं; इसके लिए प्रति एकड़ लगभग 12 से 14 किलोग्राम बीजों की ज़रूरत होती है। बेलों को ऊपर चढ़ने के लिए सहारा दें—झाड़ियों या मचान का इस्तेमाल करके—ताकि फलियाँ मिट्टी या पत्थरों के संपर्क में न आएं और खराब होने से बच जाएं। सिंचाई 7 से 10 दिनों के अंतराल पर की जा सकती है।

कद्दू की खेती के सुझाव

मार्च और अप्रैल के महीनों में पथरीली ज़मीन में कद्दू की खेती काफ़ी आसानी से की जा सकती है। दो से तीन फ़ीट की दूरी पर गड्ढे खोदें, और उनमें खाद और बीज डालें। एक एकड़ के लिए दो से तीन किलोग्राम बीज काफ़ी होते हैं। कद्दू की बेलें ज़मीन पर फैल जाती हैं, जिससे मिट्टी की सतह पूरी तरह ढक जाती है; यह फैलाव मिट्टी में नमी बनाए रखने में मदद करता है, जिससे मिट्टी इतनी जल्दी सूखती नहीं है। इस फसल को हर 8 से 12 दिन में सिंचाई की ज़रूरत होती है। कद्दू का एक खास फ़ायदा यह है कि यह बहुत मज़बूत होता है; यह खराब मौसम की स्थितियों को भी झेल लेता है और बाज़ार तक ले जाते समय टूटता या खराब नहीं होता।

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सहजन की खेती

अगर आप हर साल खेती करने की मेहनत से बचना चाहते हैं, तो सहजन (ड्रमस्टिक का पेड़) लगाना सबसे बेहतरीन विकल्प है। एक बार लगाने के बाद, सहजन का पेड़ कई सालों तक फल दे सकता है, और इसे बहुत कम पानी की ज़रूरत होती है। पौधे लगाने के लिए, 5-5 फ़ीट की दूरी पर गड्ढे खोदें। पौधे के चारों ओर पत्तियों या घास की मल्च (mulch) ज़रूर डालें; इससे पथरीली मिट्टी में नमी बनाए रखने में मदद मिलेगी। गोबर की खाद का इस्तेमाल करें और पौधे को हर 10 से 15 दिन में एक बार पानी दें। मोरिंगा पौधे की पत्तियाँ और फलियाँ, दोनों ही बाज़ार में बिकने लायक होती हैं, जिससे किसानों को पूरे साल एक नियमित आमदनी होती रहती है.

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