छत्तीसगढ़राजनांदगांव जिला

Rajnandgaon : साहित्यकार व ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित विनोद कुमार शुक्ल का कल निधन हो गया…

राजनांदगांव, संस्कारधानी में जन्में साहित्यकार व ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित विनोद कुमार शुक्ल का मंगलवार को निधन हो गया। छत्तीसगढ़ से किसी साहित्यकार को पहली बार ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया था। उनका जन्म राजनांदगांव में 1937 में हुआ था। कृष्णा टॉकीज के सामने ही उनका पैतृक निवास था। उस समय कच्चा मकान था। उनके छोटे भाई अयोध्या प्रसाद शुक्ल की पत्नी लक्ष्मी शुक्ल बताती हैं कि विनोद कुमार शुक्ल स्वभाव से ही बहुत विनोदी थे। कभी ऊंची आवाज में नहीं बोलते। बच्चे, बूढ़े, जवान सभी के साथ प्रेम पूर्वक विनोदी शैली में ही बातें करते थे।

वे बचपन से ही लेखन कार्य कर रहे थे। उनके लेखन कार्य के लिए कॉलेज से भी बहुत छूट मिलती रही। उनका उपन्यास ‘नौकर की कमीज’ सत्य घटना पर आधारित उपन्यास है। जब उस पर फिल्म बनी तब उसकी शुरुआती शूटिंग राजनांदगांव के उनके पैतृक आवास में ही हुई थी। दिग्विजय कॉलेज के प्राध्यापक व साहित्यकार शंकर मुनि राय ने इन बातों को दैनिक भास्कर से साझा किया। उन्होंने बताया कि विनोद जी के पिता का नाम शिव गोपाल शुक्ल और माता का नाम रुक्मिणी शुक्ल था। इनके पिताजी अपने 6 भाइयों में दूसरे नंबर के थे। विनोद कुमार शुक्ल चार भाई थे।

राजनांदगांव के बीएनसी मिल के बड़े अधिकारी किशोरी लाल शुक्ल ही इनके पिताजी के सबसे छोटे भाई थे। जिनके बचपन का नाम शिवलाल शुक्ल था। राजनांदगांव में उच्च शिक्षा की नींव रखने का श्रेय किशोरीलाल शुक्ल को ही जाता है। राजनांदगांव शिक्षा मंडल का गठन उन्हीं की अध्यक्षता में हुआ था।

राजनांदगांव में गजानन माधव मुक्तिबोध से विनोद कुमार शुक्ल मिलते थे। अपनी लिखी कविताएं उन्हें दिखाते थे। ऐसे ही एक दिन विनोद शुक्ल अपनी लिखी कविताएं मुक्तिबोध के पास ले गए। उनमें से 8 कविताएं उन्हें बहुत अच्छी लगी। मुक्तिबोध ने ही उनकी आठ कविताओं को साहित्यक पत्रिका कृति में प्रकाशित करने के लिए भेजा था। यहां से विनोद कुमार शुक्ल के लिखने का सिलसिला धीरे-धीरे बढ़ता गया। 1971 में पहला कविता संग्रह ‘लगभग जय हिंद’ और 1979 में पहला उपन्यास ‘नौकर की कमीज’ प्रकाशित हुआ, आगे इस पर फिल्म भी बनी।

विनोद कुमार शुक्ल ने 14-15 साल की उम्र में कविताएं और कहानियां लिखना शुरू कर दिया था। गजानन माधव मुक्तिबोध और हरिशंकर परसाई जैसे लेखकों ने शुक्ल की कविताओं की प्रशंसा की। मुक्तिबोध के जरिए ही शुक्ल की पहली कविता साहित्यिक पत्रिका कृति में प्रकाशित हुई थी। घर में साहित्य से जुड़ी किताबें-पत्रिकाएं आया करती थीं, जिन्हें शुक्ल भी पढ़ते थे। एक समय विनोद कुमार शुक्ल की लेखनी में भवानी प्रसाद मिश्र की कुछ पंक्तियां ‘मैं गीत बेचता हूं’ आ गई थी, तब उनके बड़े भाई ने उन्हें डांटा था।

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lokesh sharma

Lokesh Sharma | Editor Lokesh Sharma is a trained journalist and editor with 10 years of experience in the field of journalism. He holds a BAJMC degree from Digvijay College and a Master of Journalism from Kushabhau Thakre University of Journalism & Mass Communication. He has also served as a Professor in the Journalism Department at Digvijay College. Currently, he writes on Sports, Technology, Jobs, and Politics for kadwaghut.com.