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Capsicum cultivation: शिमला की खेती देगी छप्परफाड़ पैसा, मात्र 45 दिनों में हो जाएंगे मालामाल, जाने A1 फार्मूला ?

Capsicum cultivation: स्थानीय किसान और अनुभवी सुधाकर कुमार सिंह के अनुसार, शिमला मिर्च (capsicum) की खेती इस समय ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए एक “गेम-चेंजर” साबित हो रही है। सही तकनीकों का इस्तेमाल करके और बाज़ार की अच्छी समझ रखते हुए, किसान ज़मीन के छोटे-छोटे टुकड़ों पर भी बंपर पैदावार हासिल कर रहे हैं।

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Capsicum cultivation: इस खेती की सफलता

इस खेती में सबसे ज़रूरी बात है पौधों को लगाने (transplantation) का सही समय। श्री सुधाकर का सुझाव है कि पौधों को लगाने का काम 15 सितंबर तक हर हाल में पूरा हो जाना चाहिए। खेती के लिए हमेशा ऊँची ज़मीन चुननी चाहिए ताकि जलभराव (waterlogging) की समस्या न हो; इससे पौधों की जड़ें सुरक्षित रहती हैं और तेज़ी से बढ़ पाती हैं।

Capsicum cultivation: आर्थिक नज़रिए से

यह फसल बहुत ही कम खर्चीली है। ज़मीन के सिर्फ़ एक कठा (ज़मीन मापने की एक स्थानीय इकाई) पर खेती करने का कुल खर्च ₹3,000 से ₹4,000 के बीच आता है। अगर मौसम ठीक रहे और फसल में कीड़े न लगें, तो पहली कटाई सिर्फ़ 45 दिनों में शुरू हो सकती है, जिससे किसानों को शुरुआती सीज़न में ही अच्छे दाम मिल जाते हैं।

Capsicum cultivation: मुनाफ़े का हिसाब

इसमें मुनाफ़े की संभावना चौंकाने वाली है; ज़मीन के एक कठा से ₹50,000 से ₹55,000 तक की कमाई हो सकती है। बाज़ार में शिमला मिर्च की लगातार बढ़ती माँग इसे एक सुरक्षित निवेश बनाती है। यह जल्दी तैयार होने वाली फसल है, जिससे पारंपरिक अनाज वाली फसलों के मुकाबले कई गुना ज़्यादा आर्थिक फ़ायदा मिल सकता है।

Capsicum cultivation: मिट्टी का स्वास्थ्य

मिट्टी के स्वास्थ्य के मामले में जैविक खाद (organic fertilizers) पर खास ज़ोर देते हैं। वह रासायनिक खाद का सीमित इस्तेमाल करने के साथ-साथ वर्मीकम्पोस्ट (केंचुआ खाद/गोबर की खाद) के इस्तेमाल की सलाह देते हैं। उनके अनुसार, ज़मीन के हर 5 कठा पर कम से कम 15 बोरी वर्मीकम्पोस्ट डालने से लंबे समय तक मिट्टी की उर्वरता और फसल की गुणवत्ता दोनों बनी रहती हैं।

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आधुनिक खेती

आधुनिक खेती के क्षेत्र में, ड्रिप सिंचाई (बूंद-बूंद सिंचाई प्रणाली) एक वरदान साबित हो रही है। इस प्रणाली के ज़रिए “फर्टिगेशन” तकनीक अपनाकर, खाद और पानी सीधे पौधों की जड़ों तक पहुँचाए जाते हैं। इससे न केवल संसाधनों की भारी बचत होती है, बल्कि—उर्वरकों के सटीक प्रबंधन के कारण—फल का आकार और उसकी चमक भी काफी बढ़ जाती है।

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