इंडोनेशिया के सबसे पश्चिमी प्रांत आचे के निवासी गुस्से और मायूसी से भरे हुए हैं। नवंबर में आए एक दुर्लभ चक्रवाती तूफान के बाद आई भीषण बाढ़ ने यहां तबाही मचा दी, लेकिन लोगों का गुस्सा प्रकृति से ज्यादा सरकार की सुस्त और अव्यवस्थित प्रतिक्रिया पर है। यह संकट प्रबंवो सुबियांतो की सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है।
क्या हुआ?
नवंबर 2024 में आए चक्रवात ने सुमात्रा द्वीप पर भारी बाढ़ ला दी। इस आपदा में अब तक 1,000 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और लाखों लोग बेघर हुए हैं। सबसे ज्यादा मौतें आचे प्रांत में हुई हैं, जहां आज भी बहुत से लोगों को साफ पानी, भोजन, बिजली और दवाइयां नसीब नहीं हो पा रही हैं। संकट की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उत्तरी आचे के गवर्नर इस्माइल ए जलील हाल ही में मीडिया के सामने भावुक हो गए। उन्होंने आंसू भरी आंखों से पूछा, हालांकि, राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो का रुख बिल्कुल अलग है। उन्होंने विदेशी सहायता स्वीकार करने से इनकार कर दिया है और दावा किया है कि स्थिति ‘नियंत्रण में’ है। उनका कहना है कि इंडोनेशिया खुद ही इससे उबरने में सक्षम है। सरकार ने इसे ‘राष्ट्रीय आपदा’ घोषित करने की मांगों को भी नजरअंदाज किया है, जिससे आपातकालीन फंड और संसाधनों का प्रवाह तेज हो सकता था
सफेद झंडे: आत्मसमर्पण नहीं, संकेत हैं मदद के लिए
प्रशासनिक उदासीनता के खिलाफ आचे की राजधानी बांदा आचे में लोग सड़कों पर उतर रहे हैं। प्रदर्शनकारी सफेद झंडे लहरा रहे हैं। उनका कहना है कि ये झंडे आत्मसमर्पण के नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान खींचने और मदद की गुहार लगाने के प्रतीक हैं एक प्रदर्शनकारी हुस्नुल खवातिन्निसा ने कहा, “झंडे लहराने का मतलब यह नहीं है कि हम हार मान रहे हैं। ये बाहर मौजूद दोस्तों को बताने का संकेत हैं कि आचे में हालात बहुत खराब हैं।”
बचाव और राहत कार्यों की धीमी गति से लोग बेहद निराश हैं। एक प्रदर्शनकारी नुरमी अली ने चिल्लाते हुए कहा, “हमें कब तक कीचड़ और बाढ़ के पानी में खुद को धोना पड़ेगा 2004 की सुनामी की दर्दनाक यादेंयह त्रासदी आचे के लोगों केलिए 2004 की भीषण सुनामी की याद ताजा कर रही है, जिसमें इसी इलाके में हजारों लोग मारे गए थे। हैरानी की बात यह है कि स्थानीय लोगों का कहना है कि उस उस विनाशकारी सुनामी के बाद भी राहत कार्य इस बार के मुकाबले कहीं ज्यादा तेज और प्रभावी थे। 2004 के बाद दुनिया भर से अरबों डॉलर की मदद और एक समर्पित पुनर्निर्माण एजेंसी ने हालात सुधारने में मदद की थी। आज, लोगों को लगता है कि उन्हें अकेला छोड़ दिया गया है रिंदू मजालीना, जो 2004 में सुनामी से बच गई थीं, कहती हैं, “सुनामी के बाद सभी ने तुरंत कार्रवाई की और समुदाय जल्दी उबर गया। लेकिन अब हम जो झेल रहे हैं वह इससे भी बदतर है… हम भूख से मर रहे हैं।“ उनका घर बह गया है और वह अपने तीन बच्चों को खिलाने के लिए संघर्ष कर रही हैं।
फैक्ट चेक: सरकार क्या कह रही है?
- सरकार का दावा: प्रबोवो प्रशासन का कहना है कि राहत कार्य ‘राष्ट्रीय स्तर’ पर चल रहे हैं और पुनर्निर्माण के लिए लगभग 60 ट्रिलियन रुपिया (3.6 अरब डॉलर) जारी किए गए हैं।
- जमीनी हकीकत: प्रभावित लोगों, स्थानीय अधिकारियों और स्वतंत्र मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह सहायता जरूरतमंदों तक प्रभावी ढंग से नहीं पहुंच पा रही है। सफेद झंडे और विरोध प्रदर्शन इसी असंतोष का प्रमाण हैं।
- विदेशी मदद का मामला: कई देशों ने मदद की पेशकश की है। उदाहरण के लिए, संयुक्त अरब अमीरात ने मेदान शहर को राहत सामग्री भेजी, लेकिन केंद्र सरकार के निर्देश पर इसे वापस भेज दिया गया।
विश्लेषक क्या कहते हैं?
विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रपति प्रबोवो का विदेशी मदद लेने से इनकार देश की ‘संप्रभुता’ का प्रतीकात्मक प्रदर्शन है। विद्यांदिका जाति परकासा, एक राजनीतिक शोधकर्ता, के अनुसार, “विदेशी सहायता के लिए द्वार खोलना विदेशी जांच को आमंत्रित करने जैसा है… वे असफल नहीं दिखना चाहते।” हालांकि, यह रणनीति उल्टा भी पड़ सकती है अगर हालात और बिगड़े।
आलोचक यह भी कहते हैं कि सरकार की नीतियाँ, जैसे ताड़ के तेल के बागानों का विस्तार, वनों की कटाई का कारण बनी हैं, जिससे बाढ़ का प्रभाव और गहरा हुआ है।
