
राइस मिलर्स की ‘मन की बात’—प्रशासनिक लापरवाही, न्यायिक देरी और उद्योग की अंतिम पुकार हाईकमान तक पहुँची
राजनांदगांव. छत्तीसगढ़ के राइस मिलर्स ने अपनी पीड़ा और संकट को लेकर देश की सर्वोच्च संवैधानिक व न्यायिक संस्थाओं तक एक मार्मिक पत्र भेजा है। ‘मन की बात’ शीर्षक से लिखे इस विस्तृत पत्र को रजिस्टर्ड पोस्ट और ई-मेल के माध्यम से प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और राज्य के मुख्यमंत्री को प्रेषित किया गया है। मिलर्स ने इसे आगामी अवमानना याचिका की सुनवाई में संलग्न करने की घोषणा भी की है।पत्र में मिलर्स ने आरोप लगाया है कि छत्तीसगढ़ में प्रशासनिक तंत्र की हठधर्मिता और लालफीताशाही ने घरेलू धान–मिलिंग उद्योग को “मृत्युशैया” पर पहुँचा दिया है। उनका कहना है कि वर्षों से न्यायालय के स्पष्ट आदेशों के बावजूद अधिकारियों द्वारा पालन नहीं किया गया, और अवमानना याचिकाओं में भी लगातार देरी हो रही है।न्यायिक आदेशों का पालन नहीं, मिलर्स हताशमिलर्स का कहना है कि हाई कोर्ट के फ़ैसलों को अधिकारी “रद्दी की टोकरी” की तरह नजरअंदाज कर रहे हैं। अवमानना याचिकाओं पर तारीखें टल रही हैं और आदेश रिज़र्व रखे जाने से न्याय व्यवस्था तक पहुँचना मुश्किल हो गया है।भौतिक सत्यापन पर गंभीर प्रश्न—‘एक दिन में दर्जनों मिलों की जांच कैसे?’मिलर्स ने भौतिक सत्यापन प्रक्रिया को “मनमानी और भ्रष्टाचार से ग्रस्त” बताया है। उनका कहना है कि एक ही दिन में दर्जनों मिलों का सत्यापन दिखाया गया, जबकि जमीन पर न हम्मालों का भुगतान हुआ, न तौल-कांटा उपयोग में आया।कुछ मिलों को रातों-रात 67% झड़ती (Yield) दे देना, जबकि तकनीकी रूप से यह असंभव है, बड़े पैमाने पर अनियमितताओं का संकेत बताया है।आर्थिक संकट—भुगतान रोका, BG रिन्यू कराने का दबावमिलर्स ने कहा कि मार्कफेड द्वारा भुगतान “टेक्निकल इश्यू” का हवाला देकर रोका जा रहा है, जबकि मिलें बंद होने के बावजूद बैंक गारंटी रिन्यू कराने की बाध्यता उन पर जबरदस्त आर्थिक बोझ डाल रही है। MSME कानून के बावजूद वर्षों तक भुगतान अटका हुआ है।RTI को लेकर भी गंभीर आरोपराज्य सूचना आयोग के आदेश के बावजूद मार्कफेड द्वारा जानकारी से इंकार करने को मिलर्स ने “RTI की खुली अवहेलना” बताया है।ओडिशा मॉडल की मिसालमिलर्स ने उल्लेख किया कि पड़ोसी राज्य ओडिशा में इसी DCP सिस्टम के तहत मिलिंग का भुगतान प्रति माह किया जाता है। सवाल उठाया कि जब ओडिशा में यह संभव है तो छत्तीसगढ़ में क्यों नहीं?प्रदेश के घरेलू उद्योग की होती गिरावट पर गहरी चिंतापत्र में कहा गया है कि भुगतान अटकने और सत्यापन की विसंगतियों के कारण हजारों मजदूर बेरोजगार हो रहे हैं, सैकड़ों मिलें दिवालिया होने की कगार पर हैं और सरकार को टैक्स का बड़ा नुकसान हो रहा है।मिलर्स की सरकार और सर्वोच्च संस्थाओं से गुहारमिलर्स ने मांग की है—ओडिशा की तर्ज पर तत्काल भुगतान व्यवस्था लागू की जाए।भौतिक सत्यापन की CBI या उच्च स्तरीय समिति से निष्पक्ष जांच कराई जाए।न्यायालय के आदेशों की अवमानना करने वाले अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई की जाए।फंसाए गए मिलर्स को तत्काल राहत और बकाया भुगतान दिया जाए।मिलर्स ने अंत में लिखा है— “हम थक चुके हैं… कृपया अब और देरी न करें। हमारे अस्तित्व को बचा लीजिए।”छत्तीसगढ़ के राइस मिलर्स का यह पत्र अब राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है और सभी की नजरें संबंधित उच्च संस्थाओं की प्रतिक्रिया पर टिकी हैं।





