पश्चिम बंगाल में चल रही मतदाता सूची के विशेष संशोधन (एसआईआर) की प्रक्रिया को लेकर राज्य के सिविल सेवा अधिकारियों के एक संघ ने गंभीर सवाल उठाए हैं। अधिकारियों का कहना है कि मतदाताओं के नाम सूची से बिना उनकी जानकारी के हटाए जा रहे हैं, जबकि कानून के मुताबिक यह अधिकार सिर्फ मतदाता पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) के पास है।
पश्चिम बंगाल सिविल सेवा (कार्यकारी) अधिकारी संघ ने मुख्य निर्वाचन अधिकारी और चुनाव आयोग को पत्र लिखकर आगाह किया है कि एसआईआर प्रक्रिया के दौरन मतदाता सूची से नाम हटाने का काम एक केंद्रीकृत सॉफ्टवेयर के जरिए हो रहा है। संघ का दावा है कि इस प्रक्रिया में ईआरओ, जो कानूनन इसके लिए जिम्मेदार प्राधिकारी हैं, को दरकिनार किया जा रहा है।
क्या कहता है कानून?
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के अनुसार, अगर किसी मतदाता की पात्रता पर सवाल उठता है, तो उसे नोटिस भेजने और उसकी सुनवाई करने का अधिकार केवल संबंधित ईआरओ का है। नियम यह भी कहता है कि किसी का नाम हटाने से पहले उसे स्पष्टीकरण देने का मौका जरूर दिया जाए।
अधिकारियों की क्या चिंता है?
संघ के महासचिव सैकत अशरफ अली के मुताबिक, सॉफ्टवेयर के जरिए स्वचालित तरीके से नोटिस जारी हो रहे हैं और नाम हटाए जा रहे हैं। इससे दो बड़ी समस्याएं हैं: आम नागरिक यह समझेंगे कि नाम हटाने की जिम्मेदारी ईआरओ की है, जबकि वास्तव में वे इस प्रक्रिया से अलग-थलग हैं। हो सकता है कि कई वास्तविक और पात्र मतदाताओं का नाम गलती से सूची से काट दिया जाए, क्योंकि उन्हें अपना पक्ष रखने का उचित मौका नहीं मिल पा रहा।
एक ईआरओ ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “सॉफ्टवेयर खुद ही 2002 की पुरानी सूची से मिलान न होने वाले मतदाताओं के लिए नोटिस तैयार कर देता है। जिन मामलों में ‘तार्किक विसंगतियां’ हैं, उनमें किसे बुलाना है, यह फैसला भी ईआरओ का नहीं, बल्कि चुनाव आयोग का है।”
चुनाव आयोग का क्या कहना है?
पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने बताया कि इस प्रक्रिया की शुरुआत से पहले ही अक्टूबर में सभी अधिकारियों को स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए गए थे। उनका कहना है कि सबसे पहले उन 31 लाख मतदाताओं के मामलों की सुनवाई होगी, जिनका 2002 की सूची से मिलान नहीं हुआ है। इसके बाद, ‘तार्किक विसंगतियों’ वाले मतदाताओं पर विचार किया जाएगा
आगे क्या?
अधिकारियों के संघ ने मांग की है कि चुनाव आयोग कानून का पालन सुनिश्चित करे और प्रक्रिया में पारदर्शिता लाए। साथ ही, यह स्पष्ट किया जाए कि अगर नाम हटाए जाते हैं, तो उसकी जिम्मेदारी ईआरओ पर नहीं डाली जाए। यह मामला चुनावी डेटाबेस के डिजिटलीकरण और कानूनी प्रावधानों के बीच के तनाव को उजागर करता है।
चुनाव आयोग का पक्ष क्या है?
राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी कार्यालय से एक अधिकारी ने कहा कि अक्टूबर में ही सभी डिस्ट्रिक्ट इलेक्शन ऑफिसर्स, EROs और असिस्टेंट EROs को निर्देश दे दिए गए थे। उन्होंने पूछा, “अब क्यों सवाल उठा रहे हैं? सिर्फ उन 31 लाख मतदाताओं को नोटिस जा रहे हैं जिनका 2002 डेटा से मैच नहीं। उसके बाद 1.36 करोड़ लॉजिकल अनोमली वाले केस देखे जाएंगे।” कुल मिलाकर, 1.67 करोड़ मतदाताओं पर नजर है, लेकिन ये संख्या बदल सकती है।
संघ ने चिट्ठी में ये भी जोड़ा कि बड़े पैमाने पर सिस्टम से नाम हटाना मतदाताओं के नैचुरल राइट्स का उल्लंघन है। मसलन, अगर कोई हाउसहोल्ड सर्वे के दौरान घर पर नहीं था, तो क्या उसका नाम कट जाएगा? कानून कहता है कि नाम हटाने से पहले सुनवाई जरूरी है (धारा 22 के तहत)।
मैंने इसकी जांच की और पाया कि इंडियन एक्सप्रेस की हालिया रिपोर्ट्स (दिसंबर 2025) से ये पूरी तरह मैच करता है। उदाहरण के लिए, 3 दिसंबर की खबर में 47 लाख नाम हटाने की बात है, जिसमें 22 लाख मृतक और 6 लाख शिफ्टेड शामिल हैं। 16 दिसंबर के ड्राफ्ट रोल में 58 लाख नाम हटाए गए, जो SIR प्रक्रिया का हिस्सा है। चुनाव आयोग की वेबसाइट और अन्य मीडिया जैसे यूट्यूब वीडियोज भी यही पुष्टि करते हैं कि EROs की चिंताएं वाजिब हैं, और प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग हो रही है। कोई बड़ा विरोधाभास नहीं मिला, लेकिन ये प्रक्रिया अभी चल रही है, तो अपडेट्स पर नजर रखें।
