राजनांदगांव : माइंस की रॉयल्टी से चमक रहा जिला, लेकिन खनन प्रभावित गांवों में ऊबड़-खाबड़ पगडंडी…
अंबागढ़ चौकी , वनांचल के जिन इलाके की रॉयल्टी से पूरे जिले के विकास का खाका तैयार किया जाता है। वहां के ग्रामीण आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। मानपुर और खड़गांव तहसील के दर्जनों गांव आजादी के अमृत काल में भी पक्की सड़क और सुरक्षित पुलों के अभाव में जी रहे हैं। आलम यह है कि गांवों तक पहुंचने के लिए केवल ऊबड़-खाबड़ पगडंडियां ही एकमात्र सहारा हैं।
यहां पक्की सड़क का इंतजार लोगों का सपना बना हुआ है। बारिश आई तो आफत और बढ़ जाती है। लोगों को कीचड़ से जूझकर आवाजाही करना पड़ रहा है। सड़क को लेकर कई बार मांगे भी उठाई जा चुकी है। इसके बाद भी अब तक इन गांव के लोगों को राहत नहीं मिली है। ग्राम कच्ची सड़क और पगडंडी के सहारे ही आवाजाही को मजबूर हैं। सालों से इन गांव के लोग पक्की सड़क बनने की राह देख रहे हैं। अब तक पक्की सड़क सपना ही बना हुआ है।
40 साल से अधूरी सड़क 1985 के बाद गिट्टी नहीं ब्लॉक मुख्यालय मानपुर से महज 5 किमी दूर स्थित ग्राम घोटिया की कहानी विकास के दावों की पोल खोलती है। यहां आखिरी बार सड़क का निर्माण साल 1984-85 में तत्कालीन सरपंच कटियाराम के कार्यकाल में हुआ था। उसके बाद से आज तक किसी भी जनप्रतिनिधि या अधिकारी ने सुध नहीं ली। शेरपार, घोटिया और मरापीटोला जैसे क्षेत्रों में सड़क न होने से बारिश के दिनों में ग्रामीणों को 10 से 15 किमी का चक्कर लगाकर मुख्यालय पहुंचना पड़ता है। इससे परेशानी होती है।
युवाओं का छलका दर्द: बिना सड़क कौन देगा बेटी ग्राम पंचायत सिवनी के शिक्षित युवा राजेंद्र पुरामें ने एक गंभीर सामाजिक समस्या की ओर ध्यान आकर्षित किया है। उन्होंने बताया कि झलका पारा से बोगरे पारा तक सड़क न होने के कारण गांव के लड़कों के विवाह संबंध नहीं हो पा रहे हैं। कोई भी पिता अपनी बेटी को ऐसे गांव में नहीं ब्याहना चाहता जहां पक्की सड़क तक न हो। वहीं, सड़क के अभाव में बच्चे 7 किमी पैदल चलने के बजाय स्कूल छोड़ रहे हैं (ड्रॉपआउट) या पड़ोसी जिले कांकेर के स्कूलों का रुख कर रहे हैं।
क्षेत्रीय विधायक इंद्रशाह मंडावी का कहना है कि उन्होंने 2022 के बजट में इन सड़कों को प्राथमिकता से शामिल कराया था, लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद वर्तमान सरकार प्रशासकीय स्वीकृति देने में रुचि नहीं दिखा रही है। दूसरी ओर, तेलीटोला से गुड़ाटोला जैसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों के ग्रामीण आज भी पक्की सड़क की प्रतीक्षा में हर साल बरसात का नरक झेलने को मजबूर हैं।

