कृतिदेव यहाफिलासफी ऑफ डॉक्टरेट की उपाधि सेसम्मानित हुए हरिशंकर झारराय
प्रतिभा किसी परिस्थिति का मोहताज नहीं होती। वह अपनी मंजिल की राह स्वतः बनाती हैं। उसे जब-जब अवसर मिलता है। वह अपना हुनर, अपनी कला को प्रदर्शित करने में आगा-पीछा नहीं करती। यह स्थिति उद्योग के सभी क्षेत्रों में देखने को मिलता हैं। चाहे वह ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में हो या साहित्य-अध्यात्म के क्षेत्र में हो। अर्थोपार्जन के क्षेत्र में हो या ज्ञानार्जन के क्षेत्र में। उद्यम के सभी क्षेत्रों में यह देखने को मिलता हैं। इसमें उसके जीवन रेखा का कोई भी स्वरूप उसकी बाधा नहीं बनती। वह अपनी उपस्थिति की सार्थकता सिद्ध करते रहती हैं। एक ऐसा ही समर्थ सज्जन, साहित्य के चेरा कृशक हरिशंकर झारराय जी हैं। जिन्होंने अपने जीवन पथ से कद्मताल करते हुए साहित्य के क्षेत्र में एक नया आयाम राजनांदगांव अंचल में दर्ज कराया हैं।
उन्होंने अपनी साहित्यिक अभिरूचि का परिचय देते हुए ”राजनांदगांव अंचल के रचनाकारों का हिन्दी और छत्तीसगढ़ी साहित्य के विकास में योगदान“ विशय पर मैट्स विश्वविद्यालय रायपुर से अपना शोध प्रबंध पूरा कर – ”फिलासफी ऑफ डॉक्टरेट“ की उपाधि प्राप्त की हैं ।
विदित हो कि कवि, साहित्यकार डॉ. हरिशंकर झारराय ने अपना शोध प्रबंध मैट्स विश्वविद्यालय रायपुर के निर्देशक प्रो0 डॉ. सुनिता शशिकांत तिवारी के मार्गदर्शन में पूरा कर प्रस्तुत किया। जिसे छत्तीसगढ़ कॉलेज रायपुर के प्रो0 डॉ0 शिखा बेहरा ने पर्यवेक्षक के रूप में उपस्थित होकर अनुमोदित किया। डॉ. हरिशंकर झारराय ने अपने उक्त शोध प्रबंध में राजनांदगांव अंचल के साहित्यकारों की खोज प्राचीनकाल से आधुनिक काल तक तथा वर्तमान युग के साहित्यकारों को भी उद्धृत किया हैं। इसमें राजनांदगांव के पंचम राजा महंत हिमाचलदास (1830) से लेकर उसके समकालीन व उसके पश्चात् के कवि व साहित्यकारों का भली-भांति अध्ययन कर कालक्रमानुसार उनका उल्लेख किया है, जिसमें खैरागढ़, छुईखदान, कवर्धा के साहित्यकार भी शामिल हैं। इसमें प्रमुख रूप से यहाँ की साहित्यिक त्रिवेणी के मूर्धन्य साहित्यकार डॉ. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र, गजानन माधव ”मुक्तिबोध“ के साथ-साथ स्व. कुंज बिहारी चौबे, नंदूलाल चोटिया, रमेश याज्ञिक, शरद कोठारी, सरोज द्विवेदी व उनके समकालीन सभी रचनाकारों के नाम विशेश तौर पर उल्लेखित हैं।
ज्ञात हो कि छत्तीसगढी़ साहित्य समिति से सम्बद्ध डॉ. हरिशंकर झारराय जिले के प्रथम साहित्यिक सुधि हैं जिन्होंने छत्तीसगढ़ के साहित्य सृजन परंपरा में राजनांदगांव के साहित्यिक इतिहास पर शोध कार्य प्रणयन किया हैं। डॉ. झारराय के इस शोध कार्य में वर्तमान के साहित्यकारों से मिलकर सामग्रियाँ उपलब्ध कराने में जिले के वरिश्ठ कवि/साहित्यकार एवं लोककला सर्जक आत्माराम कोशा ”अमात्य“ का योगदान उल्लेखनीय रहा।
डॉ. संतराम देशमुख ”विमल“ द्वारा तत्संबंधित पठनीय सामग्री के अलावा, डॉ. पीसीलाल यादव, शैलेन्द्र कोठारी, डॉ. जीवनलाल यदु ”राही“, गिरीश बख्शी, गोपी कृश्ण चोटिया इत्यादि से संपर्क कर सामग्रियों क संकलन किया गया। डॉ. झारराय के विद्या वाचस्पति (फिलासफी ऑफ डॉक्टरेट) की उपाधि मिलने पर छत्तीसगढ़ी व हिन्दी साहित्य जगत के सुधि जनों में हर्श व्याप्त है। इस उपलब्धि के लिये डॉ. झारराय को छत्तीसगढ़ी साहित्य सृजन समिति, साकेत साहित्य परिशद्, शिवनाथ धारा के कवि/साहित्यकारों सहित डॉ. शंकर मुनिराय ”गड़बड़“, छत्तीसगढ़ राजभाशा आयोग के जिला समन्वयक आत्माराम कोशा ”अमात्य“, डॉ. संतराम देशमुख ”विमल“ अखिलेश मिश्रा ”अकाट्य“, डॉ. दादुलाल जोशी, हरिसूरज बली सिन्हा ”रेंजर“, सुशमा सोनकर, रतिराम गढ़ेवाल, डॉ. पीसीलाल यादव, नामदेव साहू, गिरीश बख्शी, कैलाश श्रीवास्तव, अब्दुस्लाम कौसर, मानसिंह ”मौलिक“ व अन्य सभी कवि, साहियकारों ने उन्हे बधाई एवं शुभकामनाएँ दी हैं। उक्ताशय की जानकारी छत्तीसगढी साहित्य सृजन समिति के सचिव मानसिंह ”मौलिक“ के द्वारा दी गई।



