
CG : इच्छायें हैं दुःख का कारण : मनीष सागरजी महाराज…
रायपुर । उपाध्याय भगवंत युवा मनीषी परमपूज्य मनीष सागरजी महाराज साहब का कहना है कि इच्छायें ही दुःख का कारण है। क्रोध को कम करने का एक ही तरीका है कि अपनी इच्छाओं को कम करना शुरू कर दें। हमें आत्म विश्लेषण करना चाहिए। अपने भीतर के विकारों को समाप्त करने चिंतन अवश्य करें। बार-बार अभ्यास से ही यह संभव होगा।
टैगोर नगर स्थित पटवा भवन में आज धर्मसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि जितने भी महापुरुष हुए उन्होंने अपने जीने का तरीका स्वयं बनाया। दुनिया के तरीके से जीवन नहीं जिया। अपने क्रोध पर विजय पाया। मन में क्षमा, दया, करुणा का भाव लाया। लक्ष्य हमेशा ऊंचा बनाओ। उस तक पहुंचने का प्रयास करो। गलती हो जाए तो सबक सीखो और आगे बढ़ जाओ। कभी उम्मीद मत हारो।
उपाध्याय भगवंत ने कहा कि क्रोध और करुणा मन में ही रहते हैं। जब क्रोध रहता है तब करुणा नहीं रहती और जब करुणा रहती है तो क्रोध नहीं रहता है। क्रोध आता है तो शब्दों और व्यवहार का ठिकाना नहीं होता। घर का कोई सदस्य क्रोधी हो तो घर में अशांति बनी रहती है। अपने मन में क्रोध नहीं करुणा को स्थान दें। सदैव दया और क्षमा का भाव रखें।
उपाध्याय भगवंत ने कहा कि अपने आप पर विश्वास करना होगा। आपको तय करना पड़ेगा कि बगैर गुस्से के मैं कैसे रह सकता हूं। सहनशील बनना होगा। जब हमें दूसरे का गुस्सा अच्छा नहीं लगता तो हमारा गुस्सा दूसरे को कैसे अच्छा लग सकता है। मन में दृढ़ निश्चय करना होगा कि गुस्सा करना नहीं है। जो गलत है वह पूरा गलत है। यह सिद्धांत होना चाहिए। चाहे दुनिया ईर्ष्या, क्रोध करें लेकिन मैं नहीं करूंगा ये संकल्प करना होगा। जितना गहरा संकल्प होगा उतनी गहरी जागृति होगी।
उपाध्याय भगवंत ने कहा कि मुझे सुधारना ही है यह भावना होनी चाहिए। चाहे कैसी भी परिस्थिति आ जाए गुस्सा नहीं करना है। जिस चीज के लिए भगवान ने मना किया है,वही काम करते हो तो गुस्सा आता है। इच्छाएं मत रखो तो सुखी रहोगे। भीतर में इच्छाएं होती है तो मन में उपद्रव मचा रहता है। इसका असर हमारे व्यवहार में आ जाता है। हमारा व्यवहार दुर्व्यवहार में बदल जाता है। क्रोध और करुणा में सदैव करना का चयन करो।






