
भारत का कृषि बाजार क्यों नहीं खोल सकती भारत सरकार? ट्रम्प के टैरिफ युद्ध का पूरा सच
क्या आपने कभी सोचा है कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति ट्रम्प लगातार भारत पर टैरिफ (आयात शुल्क) क्यों बढ़ाते रहते हैं? असल मसला कुछ और है, और वह मसला है भारत का कृषि और डेयरी बाजार। यह विवाद कोई नया नहीं, बल्कि दशकों पुराना है। चलिए, बात करते हैं टैरिफ के इतिहास से लेकर आज के व्यापार युद्ध तक की पूरी कहानी।
टैरिफ की शुरुआत: एक इतिहास
व्यापार और टैरिफ की कहानी बहुत पुरानी है। पहले जब किसी चीज़ की कमी होती थी, तो लोग दूसरे इलाकों से व्यापार करके ले आते थे। जैसे-जैसे दूरी बढ़ी, राजाओं ने रास्ते और सुरक्षा के इस्तेमाल के लिए एक “फीस” वसूलनी शुरू कर दी। इसे मेसोपोटामिया में ‘निशातुम’ कहा जाता था। यही टैरिफ का प्राचीन रूप था। अरब व्यापारियों ने सामान की सूची वाले कागज़ को ‘तरफ़’ (सूचना) कहा, जो बाद में अंग्रेजी में ‘टैरिफ’ बन गया। 18वीं सदी तक टैरिफ का मकसद सिर्फ राजस्व कमाना था। लेकिन 1721 में ब्रिटेन ने भारत और चीन के सस्ते कपड़ों से अपने स्थानीय कारोबार को बचाने के लिए ‘कैलिको एक्ट’ लागू किया। यहीं से ‘प्रोटेक्शनिस्ट टैरिफ’ (संरक्षणवादी शुल्क) की अवधारणा आई।
1930 का ग्रेट डिप्रेशन: टैरिफ युद्ध का दौर
1929 में अमेरिकी वॉल स्ट्रीट क्रैश के बाद, हर्बर्ट हूवर राष्ट्रपति ने ‘स्मूट-हॉले टैरिफ एक्ट-1930’ लागू किया। इसने 20,000 आयातित वस्तुओं पर 40-60% तक का भारी शुल्क लगा दिया। दूसरे देशों ने जवाबी टैरिफ लगाए, जिससे वैश्विक व्यापार 66% तक गिर गया, बेरोज़गारी बढ़ी और ‘ग्रेट डिप्रेशन’ को बल मिला। इसके बाद दुनिया ने सबक सीखा कि बिना नियमों के टैरिफ युद्ध सबके लिए घातक है।
GATT और WTO का जन्म
1947 में, भारत सहित 23 देशों ने मिलकर ‘जनरल एग्रीमेंट ऑन टैरिफ्स एंड ट्रेड’ (GATT) बनाया। इसका मुख्य नियम था ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ (MFN), यानी एक सदस्य देश को दी गई छूट बाकी सभी को देनी होगी। 1995 में GATT का स्थान ‘वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइज़ेशन’ (WTO) ने ले लिया। हालांकि, देश आपस में ‘फ्री ट्रेड एग्रीमेंट’ (FTA) करके एक-दूसरे को विशेष छूट दे सकते हैं। भारत-अमेरिका: कृषि बाजार का रणनीतिक झगड़ा असली मुद्दा यहाँ शुरू होता है। अमेरिका दशकों से भारत से अपना कृषि और डेयरी बाजार खोलने की मांग कर रहा है, जिसे भारत लगातार ठुकराता आया है। इसके पीछे कुछ ऐतिहासिक और रणनीतिक कारण हैं:
PL-480 का दर्दनाक अनुभव (1956): 1960 के दशक में भारत को अमेरिका से ‘PL-480’ समझौते के तहत सस्ता गेहूँ आयात करना पड़ा। रिपोर्ट्स कहती हैं कि यह गेहूँ मानव उपभोग के लिए उपयुक्त नहीं, बल्कि सूअरों के चारे जैसा था। इससे भारत के किसान बर्बाद हुए और देश 40% गेहूँ के लिए अमेरिका पर निर्भर हो गया। 1965 के युद्ध के दौरान अमेरिका ने गेहूँ की आपूर्ति रोककर भारत को राजनीतिक रूप से दबाने की कोशिश की, जिससे देश ने ‘खाद्य आत्मनिर्भरता’ का सबक सीखा।
जीएम फसलों का खतरा: अमेरिकी कंपनियाँ ‘जेनेटिकली मॉडिफाइड’ (GM) बीज बेचना चाहती हैं। भारत में ‘बीटी कॉटन’ के अनुभव से पता चला कि इनसे किसान रॉयल्टी के नाम पर शोषित होते हैं, हर साल नए बीज खरीदने पड़ते हैं, और कीटनाशकों का खर्च बढ़ता है। सबसे बड़ा खतरा है ‘जैविक संदूषण’ – GM बीजों के जीन पड़ोस की पारंपूर्वक फसलों में मिल सकते हैं, जिससे भारत की पारंपरिक फसलें ख़तरे में पड़ जाएंगी और यूरोप जैसे बाजारों में निर्यात बाधित होगा।
डेयरी क्षेत्र का पतन: अमेरिका में डेयरी किसानों को भारी सब्सिडी मिलती है। अगर भारत ने डेयरी आयात पर टैरिफ कम की, तो अमेरिकी दूध ₹30-35/लीटर पर बिकेगा, जबकि भारत में उत्पादन लागत ही ₹50/लीटर के आसपास है। इससे 8 करोड़ डेयरी किसान परिवारों की आजीविका खतरे में पड़ जाएगी। साथ ही, अमेरिका में पशुओं को नॉन-वेज डाइट और हॉर्मोन दिए जाते हैं, जो भारत के धार्मिक व सामाजिक संवेदनाओं के खिलाफ है।
राजनीतिक व सामाजिक असर: भारत की 48% आबादी कृषि पर निर्भर है। कृषि बाजार खोलने का मतलब होगा करोड़ों लोगों की आजीविका पर संकट, जो किसी भी सरकार के लिए राजनीतिक आत्महत्या के समान है। इसीलिए किसान हर नेता के भाषण में तो ज़रूर रहते हैं।
ट्रम्प का दबाव और भारत की चुनौती
ट्रम्प का मानना है कि ‘ट्रेड डेफिसिट’ (आयात > निर्यात) अमेरिका की हानि है। चीन के साथ व्यापार घाटा कम करने के लिए उन्होंने टैरिफ युद्ध छेड़ा, जिससे अमेरिकी किसानों का चीन को निर्यात ठप्प हो गया। अब ट्रम्प चीन के विकल्प के तौर पर भारत के कृषि बाजार पर नजर गड़ाए हुए हैं। दबाव बनाने के लिए, ट्रम्प ने:
- भारत को ‘जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंसेज’ (GSP) से हटा दिया, जिससे भारतीय निर्यात को छूट नहीं मिलती।
- कुल मिलाकर 50% टैरिफ लगा दिया है (25% सामान्य + 25% रूसी तेल खरीदने पर)।
- फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) वार्ता को अटका दिया है।
भारत की रणनीति: भारत ने कृषि बाजार खोलने से स्पष्ट इनकार कर दिया है। इस टैरिफ के प्रभाव को कम करने के लिए भारत दूसरे देशों (जैसे UAE, यूरोपीय संघ) के साथ नए FTA कर रहा है ताकि निर्यात के वैकल्पिक बाजार तलाशे जा सकें। यह सिर्फ व्यापार का झगड़ा नहीं, बल्कि भारत की खाद्य सुरक्षा, किसानों की आजीविका और आर्थिक संप्रभुता का सवाल है। अतीत के कड़वे अनुभवों (PL-480) और GM फसलों के जोखिमों ने भारत को सतर्क कर दिया है। ट्रम्प का दबाव जारी है, लेकिन भारत की सरकार जानती है कि कृषि बाजार खोलना देश के सबसे बड़े सामाजिक-आर्थिक आधार को हिला देगा। आने वाला समय बताएगा कि यह रणनीतिक गतिरोध कैना सुलझता है।






