ओपिनियनछत्तीसगढ़

देर होने के खतरे ! केवल कांग्रेस के लिए ? – जिसका घोषणा पत्र प्रभावशाली होगा वह छत्तीसगढ़ के किले को फतह कर लेगा

लोकेश शर्मा

टिकट वितरण में देरी से उम्मीदवार पूरे विधानसभा क्षेत्र में मतदाताओं से जन संपर्क नहीं कर पायेगा

इससे मतदाओं में आक्रोश रहेगा । वह विपक्ष को मतदान कर सकता है।

एक क्षीण सी आशा घोषणा पत्र की है, जिसका घोषणा पत्र प्रभावशाली होगा वह छत्तीसगढ़ के किले को फतह कर लेगा।

राजनांदगांव। जी हां, चुनाव में देर होने के अपने खतरे भी हैं और वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी को देर होने के इस खतरे का सामना करना पड़ेगा, ऐसा स्पष्ट प्रतीत हो रहा है।

छत्तीसगढ़ राज्य में कांग्रेस की भूपेश बघेल के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने उपचुनाव सहित कुल 71 सीटों के भारी भरकम बहुमत के साथ विपक्ष के आरोप प्रत्यारोप को नकारते हुए बेखौफ शासन किया और भरसक अपने चुनावी वायदों को पूरा किया है। स्वयं विपक्ष के भाजपा नेताओं तक ने इस बात को स्वीकार किया है। अर्थात 80 से 85 प्रतिशत वायदे पूरे कर दिए गये हैं। अब कोई भी सरकर हो या केन्द्र की भाजपा सरकार हो, शत्-प्रतिशत वायदों को पूरा नहीं करती अथवा अन्यान्य कारणों से पूरा नहीं कर सकती है।

जहां तक प्रदेश सरकार में भ्रष्ट्राचार की बात है तो हम पूर्व में भी लिख चुके हैं कि यह प्रशासनिक अधिक है और इसमें सच्चाई भी है। इसमें नेताओं एवं विधायकों की संलग्नता भी 15 से 20 प्रतिशत तक रही है और इसी कारण लगभग 15-20 प्रतिशत विधायकों की टिकट खतरे में रही है। कांग्रेस के फीड बैक में भी इसकी पुष्टि हो चुकी है।
लेकिन इस चुनाव में इससे भी बड़ा खतरा नामों की घोषणा में होने वाली देरी है। यद्यपि कांग्रेस हाई कमान और टिकट वितरण कमेटी ने दो खतरों से बचने के लिए यह देरी की है। एक तो भीतरघात से बचने के लिए और दूसरा कांग्रेस के रोष से, अपने आक्रोश के कारण उसके अपने नेताओं के निर्दलीय खड़ा होने के भय से। अर्थात् टिकट वितरण में नामों की लिस्ट घोषित होने में इतनी देरी कर दी जाये ताकि उपरोक्त खतरे न के बराबर उठाना पड़े। इस देरी से भले दोनों खतरों से बहुत कुछ बचाव हो जायेगा लेकिन जिन्हें टिकट मिलेगी वह समय की कमी के चलते अपने विधानसभा क्षेत्र को कवर नहीं कर पायेगा। इससे चुनावी खर्चो में भले बचत हो लेकिन मतदाओं का असंतोष उम्मीदवारों की विजय रथ को रोककर उसमें बाधा खड़ी कर सकता है।

चूंकि अब तक बहुत देरी हो चुकी है। अब चुनावी पर्चे भरने, नाम वापसकी की तिथि से निपटने के बाद उम्मीदवार जनसंपर्क में कहां तक सफल होता है और मतदाओं की नाराजगी को दूर करता है यह तो चुनाव पश्चात हार – जीत के फैसले से ही पता चलेगा। ज्ञात रहे कि भाजपा ने जहां नाम घोषित करने में बाजी मार ली है वहीं चुनाव प्रचार एवं जनसंपर्क में वह अंत तक आगे बनी रहेगी।

जहां तक कांग्रेस के आश्वस्त रहने की बात है तो वह केवल किसानों को खुश रखकर यह चुनावी वैतरणी पार करने की ख्वााहिशमंद है। यद्यपि एक ब्रम्हास्त्र कांग्रेस एवं भारतीय जनता पार्टी दोनों के लिए शेष है। वह ब्रम्हास्त्र है घोषणा पत्र। जिस पार्टी के घोषणा पत्र ने मतदाओं के मन को जीत लिया, समझ लो उस पार्टी की सरकार बन जायेगी। देखें ऊंट किस करवट पर बैठता है।

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