ओपिनियन

सुखद और देशहित कारी मतदान

(शंकर मुनि राय)

17वीं लोकसभा के लिए हुए मतदान की मतगणना ने कल देश के राजनीतिक परिदृश्य को जिस रूप में प्रकट किया है वह काफी सुखद और देशहित कारी है। सुखद इसलिए कि इस बार किसी राजनीतिक दल को किसी सरकारी तंत्र या निर्वाचन आयोग की नीतियों से किसी प्रकार की शिकवा-शिकायत नहीं नजर आई। साथ ही इस बार के चुनाव में इवीएम की विश्वसनीयता पर भी किसी ने शक नहीं किया। यह स्वस्थ राजनीतिक चिंतन का संकेत है। इस चुनाव को देशहित कारी कहने का अपना मकसद यह है कि मतदाताओं का रुझान राजनीतिक बयानबाजी से प्रभावित नहीं लग रहा है। क्योंकि जिन राजनीतिक मुद्दों को राजनीतिक दलों ने हवा दिया था, उनसे भिन्न मतदान हुए हैं।

इस बार के चुनाव प्रचार में जिन मुद्दों को आधार मानकर राजनीतिक पार्टियां अपने हौसले बुलंद कर रही थीं वे मुद्दे दरकिनार हो गये। मतदान परिणाम यह साबित कर दिये कि देश की जनता अपने मुल्क में शांति और विकास के लिए मतदान करने के लिए प्रतिबद्ध है। साथ ही यह भी कि देश की जनता को बहुत दिनों तक भरमाया नहीं जा सकता। इसलिए राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे अपने राजनीतिक चिंतन को स्वस्थ आधार देने की दिशा में काम करें। चुनावी विष्लेषण का प्रदेशस्तरीय व्याख्या करें तो छत्तीसगढ़ में लोकसभा की कुल 10/11 सीटों का भाजपा के पक्ष में जाना यह साबित करता है कि इस प्रदेश की जनता अपनी वर्तमान सरकार की नीतियों का समर्थन करते हुए यहां शांति-सुव्यवस्था के साथ अपने प्रदेश की सुरक्षा के लिए मतदान करना चाहती है। यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस बार के चुनाव में छत्तीसगढ़ की जनता ने एकतरफा मतदान कर भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में विश्वास प्रकट किया है। यहां इस दल का किसी के साथ गठजोड़ नहीं था। जिस प्रकार पिछले विधानसभा चुनाव में छत्तीसगढ़ की जनता ने भाजपा को भरपूर समर्थन देकर सरकार बनाने का अवसर प्रदान किया, उसी प्रकार इस लोकसभा के चुनाव में भी केंद्र में भाजपा की मजबूत सरकार देखना चाहती है। यहां गौर करने वाली बात यह है कि छत्तीसगढ़ के इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने अधिकांश नये चेहरे उतारे थे। इन उम्मीदवारों के प्रति विश्वास जताने के पीछे जनता का मकसद यह रहा है कि वह नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केन्द्र में मजबूत सरकार देखना चाहती है। जाहिर है कि छत्तीसगढ़ की जनता को मोदी सरकार में देश ज्यादा विकासशील दिखाई पड़ रहा है। दूसरी ओर छत्तीसगढ़ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थिति बहुत ही संघर्ष शील दिखाई पड़ रही है। पिछली कांग्रेसी सरकार ने अपनी स्थिति को राजनीतिक मजबूती देने के लिए जो प्रयास किया था वह स्थाई नहीं बन सका। इसलिए उसे चाहिए कि अपने राजनीतिक चिंतन को युग परिवेश के अनुसार परिमार्जित करे। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार बनाना जितना महत्वपूर्ण है उतना ही महत्वपूर्ण है मजबूत विपक्ष का होना। अपना मानना है कि वर्तमान में पूरे देश में भाजपा और कांग्रेस ही एक-दूसरे की प्रतिद्वंद्वी हैं। इनमें एक को पक्ष और दूसरे को मजबूत विपक्ष के रूप में दिखना चाहिए।

लेकिन पूरे देश की जो राजनीतिक दशा है उसमें राजनीतिक दंगल का आधार देश की प्रमुख समस्याओं के बजाय व्यक्ति का व्यक्तित्व बनता जा रहा है। इस दंगल में मोदी जी का व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली साबित हो रहा है कि उनका विकल्प ढूंढ़ना विपक्ष के लिए कठिन होते जा रहा है। इसका राजनीतिक परिणाम यह हो रहा है कि भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार मोदी जी के भरोसे अपनी राजनीतिक पहचान बनाने लगे हैं। दूसरी ओर कांग्रेस का व्यक्तिवादी चिंतन इतना पारंपरिक चल रहा है कि नया व्यकित्व उभरकर सामने नहीं आ रहा है।

इस चुनाव में जनता ने भारतीय जनता पार्टी को केंद्र में तीसरी बार सरकार बनाने का जो अवसर प्रदान किया है उसका संकेत बता रहा है कि उसके राजनीतिक मार्ग बहुत आसान नहीं हैं। जिस प्रकार 2014 और 2019 के चुनाव में एकीकृत भाजपा को एकतरफा बहुत मिला था उसमें ज्यादा सुधार नहीं हुआ है। ज्यादा सुधार से मेरा मतलब यह है कि राजनीतिक दल को स्वयं की नीतियों पर चुनाव लड़ने का दमखम होना चाहिए। जहां गंठजोर की राजनीति चलती है वहां जनता का मतदान निर्णायक साबित होता है। इसके विपरीत फिलहाल देश में कोई ऐसा दल नहीं दिख रहा जिसे जनता खुलकर मतदान करे। यदि ऐसा होता तो केंद्र में न तो गठबंधन की सरकार बनती न मोदी जैसे व्यक्तित्व को धराशाई करने के लिए विपक्ष को ‘इंडिया’ बनाने की जरूरत पड़ती।

केन्द्र में स्वस्थ लोकतांत्रिक भविष्य की परिकल्पना करते हुए विचार करें तो संभावना यह बनती है कि भाजपा को जब कभी अपने राजनीतिक दर्प का गुमान हो, उसे उत्तर प्रदेश का वर्तमान परिणाम का राजनीतिक विश्लेषण कर लेना चाहिए। यह बात और है कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का ‘इडिया’ पत्ता मजबूत दिखाई दे रहा है तो भारतीय जनता पार्टी को अपना भविष्य निष्कंटक नहीं मान लेना चाहिए।

देश भर के चुनावी उम्मीदवारों पर एक नजर दौड़ाकर आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है कि जिन महत्वपूर्ण लोगों को जनता ने हाशिए पर खड़ा कर दिया है उनका राजनीतिक भविष्य बहुत ही खराब हो सकता है। इतना ही नहीं कुछ ऐसे चेहरे भी इस बार उछल कर सामने आये हैं जिन्हें लोग तुच्छ समझते थे। ऐसे लोगों को देखकर रहीम का दोहा याद रखना चाहिए- रहिमन देख बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि….।

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